रात बहुत याद आई
ग़ज़ल
रात बहुत याद आई और ज़रा सी बात थी
वो तिरी बात थी वो तिरी वो इक बात थी
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हम भी क्या कम थे
ग़ज़ल
हम भी क्या कम थे लेकिन उन को गवारा न था
शाम-ए-मसीहा थी या रात-ए-सियाह थी
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शाम-ए-मसीहा थी या रात-ए-सियाह थी
ग़ज़ल
शाम-ए-मसीहा थी या रात-ए-सियाह थी
हम भी क्या कम थे लेकिन उन को गवारा न था
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