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हम भी क्या कम थे लेकिन उन को गवारा न था
शाम-ए-मसीहा थी या रात-ए-सियाह थी
ओहदा-ए-काबा क्या, मैं तो ख़ुदा से डरता हूँ
जब वो अल्लाह से अल्लाह थी, मुझ से क्या बात थी
तू नहीं है तो मैं क्या हूँ, तेरे बिना क्या मैं
तेरे होंठों पे हो जो नाम, वो है मेरा नाम
रात बहुत याद आई और ज़रा सी बात थी
वो तिरी बात थी वो तिरी वो इक बात थी
हम भी क्या कम थे लेकिन उन को गवारा न था
हम भी क्या कम थे लेकिन उन को गवारा न था
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