📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

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उसके पहलू से लग के चलते हैं

ग़ज़ल 2001 187 1 जॉन एलिया
उसके पहलू से लग के चलते हैं
उसके पहलू से लग के चलते हैं

वो अजब था, उसके दिल की बात
कोई क्या जाने, कोई क्या जाने

हम तो जैसे यहाँ के थे ही नहीं
हम तो जैसे यहाँ के थे ही नहीं

हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम

तुम जिस ज़मीं पर हो मैं
तुम जिस ज़मीं पर हो मैं

जब मैं तुम्हें निशात-ए-मुहब्बत न दे सका
जब मैं तुम्हें निशात-ए-मुहब्बत न दे सका
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