📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

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तुम्हारी बात से बिखरी हैं

ग़ज़ल 1976 145 1 जॉन एलिया
तुम्हारी बात से बिखरी हैं ये बातें सारी
तुम्हारी बात से बिखरी हैं ये बातें सारी

हम तो राह-ए-मुहब्बत में कुछ इस तरह निकले
कि जैसे आईने में देखा कोई हमारी

मुहब्बत के दरिया में डूबते जाते हैं
और हर बार निकलते हैं नए उलझन में

तुम्हें भी इस पे नदामत है नहीं तो
हम आहंगी नहीं दुनिया से तेरी

किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ
तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो

तेरे इस हाल पर है सब को हैरत
तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो
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