📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

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ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं

ग़ज़ल 1994 112 0 जॉन एलिया
ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं
और अपने लिए निकलते हैं

हम तो हैरान हैं कि क्यूँ लोग
हर मोड़ पे रास्ते बदलते हैं

ख़ाक-ए-दर को भी पास रखते हैं
हम भी इस शौक़ में निकलते हैं

क्यूँ न पूछूँ कि क्या मिला उन को
वो जो हर चीज़ से निकलते हैं

ज़िंदगी क्या है एक पहेली है
लोग हर दिन नए निकलते हैं

अपनी ही आरज़ू में जीते हैं
और दूसरों को भी निकलते हैं
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