📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

वापस जाएं

मेरी हर बात बे-असर ही रही

ग़ज़ल 1985 134 0 जॉन एलिया
मेरी हर बात बे-असर ही रही
नुक़्स है मेरे हर बयाँ में क्या

चाँद तारे बिलावजह ख़ुश हैं
मैं तो किसी और से मुख़ातिब हूँ

एक नाटक है ज़िंदगी जिस में
आह की जाए, वाह की जाए

दिल तमन्ना से डर गया जानम
सारा नशा उतर गया जानम

मुस्तक़िल बोलता रहता ही रहता हूँ
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से

मेरी तारीफ करे या मुझे बदनाम करे
जिसने जो भी बात करनी है सर-ए-आम करे
#ग़ज़ल #JohnElia #UrduPoetry #Ghazal
होम खोज सहेजे प्रोफ़ाइल