📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

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कितने ऐश उड़ाते होंगे

ग़ज़ल 1959 112 0 जॉन एलिया
कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे
कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे

हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम

तुम जिस ज़मीं पर हो मैं
तुम जिस ज़मीं पर हो मैं

जब मैं तुम्हें निशात-ए-मुहब्बत न दे सका
जब मैं तुम्हें निशात-ए-मुहब्बत न दे सका

ख़ुद से हम इक नफ़स हिले भी कहाँ
ख़ुद से हम इक नफ़स हिले भी कहाँ

हम तो जैसे यहाँ के थे ही नहीं
हम तो जैसे यहाँ के थे ही नहीं
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