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ख़ुद से रिश्ते रहे कहाँ उन के
ग़म तो जाते थे राएगाँ उन के
मस्त उन को गुमाँ में रहने दे
ख़ाना-ए-बर्बाद हैं गुमाँ उन के
यार सुख नींद हो नसीब उन को
दुख ये है दुख हैं बे-अमाँ उन के
कितनी सरसब्ज़ थी ज़मीं उन की
कितने नीले हैं आसमाँ उन के
नोहा-ख़्वानी है क्या ज़रूर उन्हें
उन के नग़्मे हैं नोहा-ख़्वान उन के
#ग़ज़ल
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