📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

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जॉन शहादतजादा हूँ मैं

ग़ज़ल 1962 98 0 जॉन एलिया
जॉन शहादतजादा हूँ मैं और ख़ूनी दिल निकला हूँ
मेरा जूनू उसके कूचे से कैसे बेमातम निकले

आगे असबे ख़ूनी चादर और ख़ूनी परचम निकले
जैसे निकला अपना जनाज़ा ऐसे जनाज़े कम निकले

दौर अपनी ख़ुश-दर्दी रात बहुत ही याद आया
अब जो किताबे शौक निकाली सारे वरक बरहम निकले

है ज़राज़ी इस किस्से की, इस किस्से को खतम करो
क्या तुम निकले अपने घर से, अपने घर से हम निकले

मेरे कातिल, मेरे मसिहा, मेरी तरहा लासनी है
हाथो में तो खंजर चमके, जेबों से मरहम निकले
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