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हम तो जैसे यहाँ के थे ही नहीं
और हम जैसे बहुत सारे हैं
तेरी यादों का आलम देखकर
हम तो यूँ ही रह गए ख़ाली
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
तुम जिस ज़मीं पर हो मैं
तुम जिस ज़मीं पर हो मैं
जब मैं तुम्हें निशात-ए-मुहब्बत न दे सका
जब मैं तुम्हें निशात-ए-मुहब्बत न दे सका
#ग़ज़ल
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#Ghazal