📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

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हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या

ग़ज़ल 1971 167 0 जॉन एलिया
हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या
यही सारी हिकायत है नहीं तो

अज़ीयत नाक उम्मीदों से तुझ को
अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो

तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम
तो इस की वजह फुरसत है नहीं तो

सबब जो इस जुदाई का बना है
वो मुझ से ख़ूबसूरत है नहीं तो

हम आहंगी नहीं दुनिया से तेरी
तुझे इस पे नदामत है नहीं तो

तेरे इस हाल पर है सब को हैरत
तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो

किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ
तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो
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