📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

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हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम

ग़ज़ल 1990 178 1 जॉन एलिया
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम

तुम जिस ज़मीं पर हो मैं
तुम जिस ज़मीं पर हो मैं

जब मैं तुम्हें निशात-ए-मुहब्बत न दे सका
जब मैं तुम्हें निशात-ए-मुहब्बत न दे सका

तुम हकीकत नहीं हो हसरत हो
तुम हकीकत नहीं हो हसरत हो

इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं

हम तो जैसे यहाँ के थे ही नहीं
हम तो जैसे यहाँ के थे ही नहीं
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