📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

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आप अपना ग़ुबार थे हम तो

ग़ज़ल 1998 178 0 जॉन एलिया
आप अपना ग़ुबार थे हम तो
याद थे यादगार थे हम तो

पर्दगी हम से क्यूँ रखा पर्दा
तेरे ही पर्दा-दार थे हम तो

वक़्त की धूप में तुम्हारे लिए
शजर-ए-साया-दार थे हम तो

उड़े जाते हैं धूल के मानिंद
आँधियों पर सवार थे हम तो

हम ने क्यूँ ख़ुद पे एतिबार किया
सख़्त बे-एतिबार थे हम तो

शर्म है अपनी बार बारी की
बे-सबब बार बार थे हम तो

क्यूँ हमें कर दिया गया मजबूर
ख़ुद ही बे-इख़्तियार थे हम तो

तुम ने कैसे भुला दिया हम को
तुम से ही मुस्तआर थे हम तो

ख़ुश न आया हमें जिए जाना
लम्हे लम्हे पे बार थे हम तो

हम को यारों ने याद भी न रखा
जॉन यारों के यार थे हम तो
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