📖 जॉन एलिया · कविता संग्रह

जॉन एलिया

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आज भी तिश्नगी की क़िस्मत में

ग़ज़ल 1996 156 0 जॉन एलिया
आज भी तिश्नगी की क़िस्मत में
सम-ए-क़ातिल है सलसबील नहीं

सब ख़ुदा के वकील हैं लेकिन
आदमी का कोई वकील नहीं

है कुशादा अज़ल से रू-ए-ज़मीं
हरम-ओ-दैर बे-फ़सील नहीं

ज़िंदगी अपने रोग से है तबाह
और दरमाँ की कुछ सबील नहीं

तुम बहुत जाज़िब-ओ-जमील सही
ज़िंदगी जाज़िब-ओ-जमील नहीं

न करो बहस हार जाओगी
हुस्न इतनी बड़ी दलील नहीं
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